how to understand yourself?

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इस पोस्ट में हम जानेंगे कि कैसे पहचाने अपने मूल व्यक्तित्व को how to understand yourself?

अधिकांश व्यक्तियों को सच में नहीं पता होता कि हमारा मूल व्यक्तित्व क्या है बच्चा पैदा हुआ मां ने कहा कि मैं इसको यह बनाऊंगी पिता ने कहा मैं उसको यह बनाऊंगा चाचा ने कहा मैं इसको यह बनाऊंगा मैं इसको इंजीनियर बनाऊंगा मैं इसको डॉक्टर बनाऊंगा, इतनी पट्टी पढ़ाते हैं बचपन में ही कि वह बच्चा भूल जाता है कि वह वास्तव में क्या बनना चाहता है जैसे आप मेरे से लगभग सब लोग कुछ न कुछ बनना चाहते हैं लेकिन आप में से कम से कम एक चौथाई होंगे जिनको मूलतः बोलता कुछ बनने की इच्छा नहीं है उनको समाज में इतनी पट्टी पढ़ा दी है कि उनको यह समझ में नहीं आता कि उनको कुछ बनने की इच्छा उनके द्वारा है कि उनको समाज ने दी पट्टी पढ़ा दी है कि उनके कारण उनके मन में इच्छा प्रकट हुई है |

how to understand yourself?

तो हम मूल व्यक्तित्व पहचानने की दो प्रक्रियाएं समझ लेते हैं –

  1. निषेध की प्रक्रिया
  2. रमने की प्रक्रिया
how to understand yourself?

निषेध की प्रक्रिया :

अपवाद : कोई बच्चा बचपन से कविता लिख रहा है पिताजी ने कहा बेटा पढ़ लो वह कह रहा है नहीं पापा मुझे कविताएं लिखनी है मुझे हिमालय की गोद में जाकर छोड़ दो मैं कविता ही लिखूंगा छायावादी, पेरेंट्स को भी लगा खिसका हुआ है उसे वहां जाकर छोड़ दिया कविता ही लिखता रहा बाद में महान कवि बन गया उसी नोबेल पुरस्कार मिला पेरेंट्स करें हमने बचपन में ही छोड़ दिया अब बहुत अच्छा कभी बन गया ऐसी बहुत कम घटनाएं है ज्यादा क्या है बच्चा भी कंफ्यूज है एक दिन बोलता है बड़ा होकर कुल्फी भेजूंगा क्योंकि कितनी भी खा सकता हूं मुझे तो एक ही मिलती है हफ्ते में फिर कुछ दिन में सोचता है कुल्फी वाला ठीक नहीं है फिर वह सोचता है मैकेनिक बनूंगा मैं बिजली की तार ठीक करूंगा उसे पेचकस से खेलना अच्छा लगता है तो ऐसी बातें करता है यह चीजें चेंज होती रहती है इसका एक तरीका यह होता है कि आपके अंदर जो जो संभावनाएं हैं आप ट्राई करते जाइए आपने एक ट्राई किया मैं A बनूंगा कुछ दिन में समझ में आया यह तो बकवास है ऐसा होता है जीवन में कभी की एक विकल्प ट्राई किया मैं यह विकल्प कैरियर के समक्ष में कह रहा हूं आप कुछ और अर्थ मत निकालिएगा कुछ दिनों में लगा अरे यार यह तो बकवास है इसमें वह बात नहीं जो मुझ में है फिर B ट्राई किया C ट्राई किया वह भी चौपट निकला D ट्राई किया वह भी चौपट निकला E मे लगा हां ठीक है फिर भी ठीक है F ट्राई किया तू लगा हूं यह है इसमें वह बात है अब जाकर मुझे कुछ मन मुताबिक मिला है एक तो यह तरीका है आमतौर पर विभिन्न विकल्पों पर खारिज करते करते आप उस विकल्प तक पहुंच जाते हैं जो विकल्प दरअसल आपके मूल व्यक्तित्व से जुड़ा हुआ है एक तो यह है लेकिन खारिज हर व्यक्ति कर पाता है परंतु भारत के 90% व्यक्ति अपना जीवन उन विकल्पों के साथ जी रहे हैं जो कि दरअसल उनके मूल व्यक्तित्व के विकल्प नहीं है परंतु वह ऐसे फस चुके हैं कि उनको उसी के साथ जीना पड़ रहा है अपने पेरेंट्स को याद करके बताइए मतलब कि उनके बारे में सोच करके बताइए कि वह जो नौकरी कर रहे हैं या कार्य कर रहे हैं वह मूल व्यक्तित्व अपनी रुचि से कर रहे हैं या मजबूरी से कर रहे हैं जब कोई 4050 की उम्र में होता है उससे प्यार मोहब्बत से पूछिए कि आप जो काम करते हैं आप उससे खुश है या नहीं अगर इमानदारी से बताएं तो इमानदारी से ना बताएं तो उसको किसी और तरीके से पूछिए जैसा कि जब वह नशे में हो तब आप उससे पूछ सकते हैं कि पापा मौसा या फूफा आप जो कार्य करते हैं आप उस पर खुश हैं तो उसके बाद जो पाठ शुरू होगा अखंड पाठ शुरू होगा आप सुनकर हैरान रह जाएंगे जो उनके अंतरात्मा से आवाज निकलेगी आप सुनकर हैरान रह जाएंगे वह बोलेंगे परिवार चलाना है जीवन चलाना है बच्चे पालने हैं क्या करें मन तो हमारा भी करता था यह करें वह करें लेकिन हम नहीं कर पाए क्योंकि हम इस विकल्प मैं जाकर फस गए फिर आपको पता चलेगा बड़ा ही बेचारा व्यक्ति है यह मन तो सबका करता है मैं छोड़कर यह करूंगा वह करूंगा लेकिन जो उसमें रिस्क है उसमें उस रिस्क की वजह से वह वह कार्य कर नहीं पाता है इसीलिए भारत या अन्य देशों के 90% लोग प्रारंभिक विकल्पों में ही उलझे रहते हैं और अपने मूल व्यक्तित्व के विकल्प का चयन नहीं कर पाते हैं इसीलिए किसी ने कहा है कि सुबह होती है शाम होती है जिंदगी यूं ही चलती रहती है वहीं दिल्ली उठना नहाना सुबह 9:00 बजे ऑफिस पहुंच जाना और दिनभर आलस के साथ काम करना बिना मन के और फिर शाम को वापस 9:00 बजे घर पहुंच जाना बस के धक्के खाते हुए इसमें उसकी कोई गलती नहीं है वास्तव में काम उसके मन का नहीं है इसलिए उसका उस काम में मन नहीं लगता कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो कि कुछ अच्छी नौकरियों में होते हुए भी उनको छोड़ देते हैं उनके पिता सोचते हैं बेटा मेरे बेटा को क्या हो गया वे झाड़-फूंक भी करवाने के लिए ओझा को लेकर आते हैं परंतु बेटा उल्टा उसे झांकी झाड़-फूंक कर देता है इसके बाद मान लीजिए उस बेटे ने पटवारी का एग्जाम निकाल लिया पिता सोचता अरे बाप रे बाप मेरे घर में इतना विद्वान व्यक्ति था मुझे तो पता ही नहीं था बहुत खुश हुआ फिर मान लीजिए बेटे का हो गया पीएससी में अब तो पिता ने कहा कि बेटा मैं तो पूरे शहर में मिठाई बांट लूंगा लेकिन बेटे ने कहा पापा अभी मैं मात्र 24 साल का हूं और मैं अब आईएएस की तैयारी करूंगा मान लीजिए जी कुछ समय के बाद मैं बेटा आईएसपी बन गया इस बार पिता ने कहा कि बेटा ज्वाइन तो नहीं करोगे ना मान लीजिए इस बार बेटे ने ज्वाइन भी कर लिया परंतु 4 माह बाद वह घर वापस आ गया पिता ने कहा बेटा छुट्टी लेकर आए हो बेटे ने कहा नहीं पापा नौकरी छोड़ कर आया हूं पिता नहीं कहा अब क्या करोगे बेटे ने कहा अब खेती करेंगे अब आप समझ गए कि पिता की क्या हालत होगी तो हम इससे एक बात तो हम समझ सकते हैं की खारिज करने की प्रक्रिया में कोई व्यक्ति अपने मूल व्यक्तित्व तक पहुंचेगा या नहीं पहुंचेगा यह तो हम नहीं कह सकते लेकिन हम जरूर कह सकते हैं कि इस तरह आत्मविश्वास से भरा व्यक्ति अगर अपने विकल्पों में प्रयोग करता रहेगा तो वह जरूर अपने मूल व्यक्तित्व तक पहुंच सकता है और इसलिए अगर आपको किसी व्यक्ति की पहचान करनी हो कि वह अपने मूल व्यक्तित्व से युक्त कब हुआ तो जीवन की शुरुआत में देखिए गाया जीवन के अंत में दिखेगा अंत में लिखने की संभावना ज्यादा है यानी जो व्यक्ति बार-बार चेंज करें वह अंत में कहां रुका आप समझ सकते हैं कि वह संभवत उसके मूल्य के सबसे नजदीक रहा होगा |

रमने की प्रक्रिया :

आपने अक्सर देखा होगा कि कुछ कार्यों में आपका इतना मन लगता है कि आपको लगता है कि यह काम होता ही रहे यह कभी रुके नहीं यह वक्त कभी मेरे हाथ से निकल कर ना जाए लेकिन कुछ कार्य ऐसे होते हैं जब आपका समय कटता नहीं जैसे आपने देखा होगा कि आप अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ बैठे हैं तो आपको लगता होगा कि समय खत्म ना हो बस उन्हीं के साथ बैठे रहे और दूसरा व्यक्ति ऐसा भी होता है जैसे ही आया है आप घड़ी देखना चालू कर देते हैं और क्या कर रहे हो और पढ़ाई ठीक चल रही है आप सोचते हैं समय कब जाएगा यह व्यक्ति कब जाएगा कितना खाएगा मेरा दिमाग क्योंकि आपका जो मूल व्यक्तित्व है उसके साथ रमता नहीं है और जहां रमता है वहां 1 घंटे 2 घंटे 4 घंटे 6 घंटे भी कम लगते हैं अरे हाय भैया 6:00 बज गए मुझे लगा अभी तो 12:00 ही बजे होंगे 12:00 बजे तो आए थे 6 घंटे हो गए पता ही नहीं चला क्योंकि वहां आप रमे हुए हो तो मूल व्यक्तित्व की दूसरी पहचान है जहां आपका मन लगे अगर किसी व्यक्ति का प्रोफेशन ऐसा है कि वह उस पर रम जाता है अर्थात उसका उस पर मन लगता है मान लीजिए किसी व्यक्ति को गाने में मजा आता है तो वह सोचता है कि सिंगर ही बन जाता हूं वह गाना स्टार्ट कर देता है हर जगह जाता है तो गाने सुनना है गाने गाता है तू वह व्यक्ति अपने जीवन में जितना खुश रहेगा वह आप सोच ही सकते हैं ऐसा नहीं है कि मैं कभी भूल नहीं होगा एक समय के बाद उसको भी बोरियत होगी लेकिन यह उस व्यक्ति से ज्यादा खुश होगा जिसने उस विकल्प को चुना था इसमें उसका मन नहीं लगता था |

तो दोस्तों इन दोनों तरीकों से आप अपने मूल व्यक्तित्व को पहचान सकते हैं दोस्तों आपको हमेशा अपना मूल व्यक्तित्व अपनी इच्छा और लग्न की खरीदना चाहिए जिस कार्य में आप का मन लगे आप ही करिए और निश्चित ही आप अपने करियर में 1 दिन बहुत ही सक्सेसफुल बनेंगे और आपका जीवन बहुत ही सरलता पूर्वक और अच्छा गुजरेगा तो ही शब्दों के साथ मैं अपने इस आर्टिकल को विराम देता हूं उम्मीद है आजकल आपको पसंद आया होगा अगर आपको पसंद आया तो प्लीज लाइक और कमेंट करना ना भूले |

धन्यवाद

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